SAFETY SAVVES

"बोलोगे-की-बोलता-है" fb link

किताब "बोलोगे की बोलता है "का कलेवर ...

किताब "बोलोगे की बोलता है "का कलेवर ...
...बोलोगे कि बोलता है

...बोलगे कि बोलता है ,आन लाइन


Enlarge this document in a new window
Online Publishing from YUDU

Thursday, 10 September 2009

मेरा प्रलाप पढ़ कर व्यथित न होना .

बन्धुवर , 



मेरा प्रलाप पढ़ कर व्यथित न होना . 


क्या है ,कि ये  अनर्गल प्रलाप ही बचा है मेरे अधिकार क्षेत्र मैं ..वोट देते हैं चोट खाते हैं ;चोट खा के 


भूल जाते हैं .भूल भाल कर फिर चोट खाते हैं फिर चोट खाते हैं सहलाते हैं ,फिर धीरे  धीरे भूल जाते 


हैं . 


हम अपनी आय से हाय  किये बिना आयकर कटवाते हैं ;अपने दिए आयकर के दुरूपयोग को देखते 


हैं मन मार कर रह जाते हैं कुछ नहीं कहते .मुझे क्या पडी है जो प्रलाप किये जा रहा हूँ ? बहरों के 


शहर  में रेडियो बेचने निकला हूँ . अंधों के शहर में आईने लिए घूमने वालों में से एक हूँ .


मेरी आयकर से कटा राजस्व ,किन  बिल्लोटों के भाग्य के छींके फूटता है देख देख कर कोफ्त होती 


है .


स्कूल चलें हम   पर आने वाले व्यय/अपव्यय कि सोच सोच कर दिमाग का दही होता रहता है . 


दोपहर के खाने की योजना को कौन कौन खा पका रहा है ये सोचने कि फुर्सत किसी को नही . देश 


को कौन चबा/चला रहा है? कहाँ है भारत भाग्य विधाता जन गन मन अधिनायक कहाँ है ..


भूसे के ढेर में से सूई तो मोल सकती है किन्तु भारत भाग्य विधाता ...??



छोडिये ना हम बोलेगा तो बोलो गे कि बोलता है .


--
deepzirvi
9815524600

Tuesday, 8 September 2009

रोगी ही उपचार न करवाना चाहे तो हम क्यों बोलें


हमारी मूढ़ मती आज सुबह से खुजिया रही थी ,विचारो का ग्रेह युद्घ चल रहा था . बे रोजगारों की मांग की तरह हमारे अक्लदान का पन्ना भी भरा हुआ था ;जैसे की हर वक्ता को वहम होता है की स्रोत उसको सुन रहा है एवं जो कुछ वक्ता जानता है उसका दशमांश भी श्रोता को नही मालूम . वैसे ही हर ब्लाग्गेर को भे यह राहत रहती है की उसके ब्लाग मैं जो है बस... आज शनिचर है तो कुदर तन कल रवि को ही आना होगा .
ब्लोग्गेर्स,ओर्कट वाले ,यू ट्यूब वाले जैसे किसी त्रिकोने आकार का सा कोई नाता है . यू ट्यूब पर किसी कमलेश जी का प्रताप /प्रलाप दिखा ,सोचा मुल्क आज़ाद है भई . फिर नर नारी को बराबरी की वकालत ही सर्वत्र होती है .
नर नारी की बराबरी के प्रश्न पर फिर मेरी मूढ़ मती घास चरने चली जाती है
भारत भर में ज्वलंत विषय है नर नारी की समानता , लेखको की कलम भी इस विषय पर खूब चलती है ,भाषण प्रतियोगिताओं में इस विषय पर बोल कर इनाम पर अधिकार करना आसान रहता है ,किन्तु मैं औंधी खोपडी भारी पलकों वाला मूढ़ प्राणी हूँ मुझे समानता की चाह कभी दिखी नहीं ,ठीक उसी तरह जैसे दलित ,शब्द दलित से मुक्ति नहीं पाना चाहते क्युकी ऐसा करने से सुविधाए खो जाने का भय बना रहता है .नर नारी समानता का प्रश्न भी ऐसा ही है . जब बात अधिकारों की रहती है समान अधिकारों की बात शोर से कही सुनाई जाती है . किन्तु जब बात कर्तव्य पालन की हो तो ...
सामान्य दृश्य है ;किसी भी बस में देखिये सामान्यत किसी लेडी सवारी को खडा देख कर कोई भी सुसंसंकारित पुरुष अपनी सीट छोड़ दे गा किन्तु किसी बजुर्ग बीमार पुरुष के लिए किसी नारी को सीट छोढते कम से कम मै ने नही देखा .
सहकर्मी महिलाओं की धारणा ये बनी देखी है की वो तनखाह तो बराबर लेंगे ,छुट्टी औ अन्य लाभ पुरषों से भी अधिक किन्तु सख्त काम आ जाये तो वो पुरुष सह कर्मियों से आशा रखती है की ये काम तो उन के हिस्से ही चला जाये . कैसी समानता?? कौन चाहता है ऐसी समानता .
मै कहता की चलिए एक ऐसा समाज निर्माण किया जाए जहां कोई दलित /पद दलित न हो ... जहां समानता हो ... जहां कोई बुधू न हो सभी बुध्ध पुरुष हों मैं अपना सर रखता हूँ नींव के पथथर की जगह .. किन्तु कोई चाहे भी तो समानता . रोगी ही उपचार न करवाना चाहे तो हम क्यों बोलें
हम बोले गा की बोलो गे की बोलता है
--
deepzirvi9815524600

http://deepkavyanjli.blogspot.com

Saturday, 5 September 2009

चलो ग्राम की और ,चलो गौधाम की और ,चलो हासिल करें स्वालम्बन

चलो ग्राम की और ,चलो गौधाम की और ,चलो हासिल करें स्वालम्बन  
मित्रो ,
नमस्कार;
इक्कीसवीं सदी को फलांगते बीसवीं सदी की सोच सोचना पुरातन पंथी कहलाती है ; है ना?  किन्तु मात्र किसी प्रचार तन्त्र के छलावे के छले अपने सोने को पीतल कहना क्या कहलायेगा? सोचो ? 
इन्फो टेक , कम्पुटर के युग में यदि cow-tech की बात करूं तो कदा चित मुझे पागल समझा जायेगा !
किन्तु तो भी मैं बात छेडू गा .
दोस्तों, क्यूबा की बात आप सभी सुधीजनों को मालूम है . क्यूबा पर लगी आर्थिक पाब्न्दिआ उस को कुकनुस बना गयी ,वो अपने गो धन और पुरानी तकनीकों का सदुपयोग कर के उभर आया .
हमारे यहाँ के गौधन की स्थिति क्या है ? गोऊ की बात आरम्भ करूं इस से पूर्व ये बता दूं गौ केवल हिन्दुओं की ही माता नहीं वर्ण गौ को समझने वाले हर प्राणी की माता है . विलक्ष्ण गुणों से भरपूर गौ के अनेक लाभ है जिनसे यदि साधारण जन अवगत हो जाये तो गो घात करने वालों को भागने के लिए जगह नहीं मिले गी .
गौमूत्र सरव साधारण के लिए सुलभ है . मेरे पिता जी और दादा जी आयुर वैदिक उपचार किया करते थे . शुधि कर्ण के लिए वो गौ मूत्र ही सुझाया करते थे . हजारों रोगियों का उपचार निशुल्क मात्र गौ मूत्र से ही किया गया .
पंचगव्य को कौन भूल सकता है, आप अपने किसी भी बजुर्ग से पूछो व्ही खिल उठे गा .गौमूत्र कचरे से खाद बनाने की प्रकिरिया तेज़ करता है . रेडियो धर्मिता को अंकुश लगाने के लिए परमाणू रेअक्ट्रों मैं भी गोबर लेपन की बात मैं ने खिन पढ़ी है .
एक गौ की सुरक्षा कर हम अपने देश को स्वालम्बी बना सकते है . भू माफिया की संथ गाँठ से हडपी गयी गोचर भूमि को स्वतंत्र करा सकते है , हम क्यूबा से जो बेशक कोई हिन्दू राष्ट्र नही था तो भी जिस ने गौ धन का सदुपयोग खेती/ कीटनाशक /खाद / के लिए किया और बहुदेशीय चंगुल से बच निकला . 
आओ संकीर्ण सोच को त्याग दें की गौ ,मात्र हिन्दू की मां है , गौ धन का सदुपयोग कर के देखिये ये पूरे हिन्दुस्तान की मां बन कर सभी को अपने वरदानों से मालामाल कर दे गी .
हाँ ,बहुदेशीय कम्पनिया ये नही चाहती  .. अब सोचना आप को है ;करना आपको है ;हम बोलेगा तो बोलो गे की बोलता है .

--
deepzirvi
9815524600
--
deepzirvi
9815524600

Friday, 28 August 2009

ये बचपन प्यारा कहाँ जा रहा है

ये बचपन प्यारा कहाँ जा रहा है 
'ब्लॉगर' दुनिया को देखने के लिए अलग चश्मा पहना करते हैं, सेंकडों ब्लोग्स हजारों लाखों की संख्या में ब्लॉग पाठक . आप की कचेहरी में आज कुछ प्रलाप चेष्टा करूंगा चूंकि हमारे बोलने पे लोग बोलते हैं की हम बोलता है , सो हम कुछ नही बोलेगा ...
आज छुट्टी थी ,सुबह चाह   की चुस्की के साथ  मेरे कथित खोपडे में उपद्रव होना शुरू हो गया . दिमाग में जाने कहाँ से आयातित कमिशन खाके एक कीडा सा घुस गया जो अब तक मेरी मंद बुध्धि को और कुंद और मंद कर रहा है .
मेरी अक्ल्नाश हो चुकी हो तो भी अक्ल मन्दो का अकाल नही पडा है .
फिर ??
फिर भी यूं होता है तो क्यों होता है ?क्यों खो रहा है बचपन किताबों के बोझ तले ,
एक और कहने वाले ये कहते हैं "बच्चों के प्यारे ख्वाबों को चाँद सितारे छूने दो ,चार किताबें पढ कर ये भी हम जैसे हो जायेंगे "
दूसरी और मात्र अढाई बरस के अबोध को स्कूल यात्ना ग्रेह भेजा जाना ??
कौन है जो मासूमों की मासूमियत लील जाना चाहता है ? क्या माँ बाप ? समाज हम और आप अथवा हम सब का बाप पूँजीवाद का छद्मरूप बाज़ार का प्रपंच ...
??????????????????????????????????????????????????????????/

--
deepzirvi9815524600
http://deepkavyanjli.blogspot.com
आज का दौर तरह-तरह के तनाव को जन्म देने वाला है ,घर-परिवार ,कार्यालय ,सामाजिक परिवेश का वातावरण निरन्तर जटिल एवं तनावपूर्ण होता जा रहा है ,इसका सबसे पहले शिकार बनते हैं निरीह बच्चे ।घर हो या स्कूल , बच्चे, समझ ही नहीं पाते कि आखिरकार उन्हें माता-पिता या शिक्षकों के मानसिक तनाव का दण्ड क्यों भुगतना पड़ता है। घर में अपने पति /पत्नी या बच्चों से परेशान शिक्षक छात्रों पर गुस्सा निकालकर पूरे वातावरण को असहज एवं दूषित कर देते हैं। विद्यालय से लौटकर घर जाने पर फिर घर को भी नरक में तब्दील करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते ।यह प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण छात्रों के मन पर गहरा घाव छोड़ जाता है । कोरे ज्ञान की तलवार बच्चों को काट सकती है ,उन्हें संवेदनशील इंसान नहीं बना सकती है ।शिक्षक की नौकरी किसी जुझारू पुलिसवाले की नौकरी नहीं है,जिसे डाकू या चोरों से दो-चार होना पड़ता है ।शिक्षक का व्यवसाय बहुत ज़िम्मेदार, संवेदनशील ,सहज जीवन जीने वाले व्यक्ति का कार्य है ; मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति का कार्य- क्षेत्र नहीं है । आज नहीं तो कल ऐसे दायित्वहीन,असंवेदनशील लोगों को इस क्षेत्र से हटना पड़ेगा या हटाना पड़ेगा।प्रशासन को भी यह देखना होगा कि कहीं इस तनाव के निर्माण में उसकी कोई भूमिका तो नहीं है ? छात्रों पर बढ़ता निरन्तर पढ़ाई का दबाव ,अच्छा परीक्षा-परिणाम देने की गलाकाट प्रतियोगिता कहीं उनका बचपन ,उनका सहज जीवन तो नहीं छीन ले रही है ?घर,विद्यालय ,कोचिंग सेण्टर सब मिलकर एक दमघोंटू वातावरण का सर्जन कर रहे हैं । बच्चे मशीन नहीं हैं ।बच्चे चिड़ियों की तरह चहकना क्यों भूल गए हैं? खुलकर खिलखिलाना क्यों छोड़ चुके हैं ?माता-पिता या शिक्षकों से क्यों दूर होते जा रहे हैं ? उनसे अपने मन की बात क्यों नही कहते ? यह दूरी निरन्तर क्यों बढ़ती जा रही है ?अपनापन बेगानेपन में क्यों बदलता जा रहा है? यह यक्ष –प्रश्न हम सबके सामने खड़ा है। हमें इसका उत्तर तुरन्त खोजना है ।मानसिक रूप से बीमार लोगों को शिक्षा क्षेत्र से दूर करना है ।मानसिक सुरक्षा का अभाव नन्हें-मुन्नों के अनेक कष्टों एवं उपेक्षा का कारण बनता जा रहा है ।क्रूर और मानसिक रोगियों के लिए शिक्षा का क्षेत्र नहीं है ।जिनके पास हज़ारों माओं का हृदय नहीं है ,वे शिक्षा के क्षेत्र को केवल दूषित कर सकते हैं ,बच्चों को प्रताड़ित करके उनके मन में शिक्षा के प्रति केवल अरुचि ही पैदा कर सकते हैं।हम सब मिलकर इसका सकारात्मक समाधान खोजने के लिए तैयार हो जाएँ । अभिभावकों के पास सबके लिए समय है ,घण्टों विवाद के लिए समय है ,विश्वकी राजनीति पर बहस करने के लिए समय है;अगर समय नहीं है तो सिर्फ़ बच्चों के लिए ।उन बच्चों के लिए ;जो उनका वर्तमान तो हैं ही साथ ही उनका भविष्य भी हैं ।बच्चों से आत्मीयता से बात करें तो उनके मन का एक पूरा संसार अपने व्यापक रूप के साथ ‘खुल जा सिम-सिम’ की तरह खुल जाएगा ।अभिभावकों को लगेगा कि उनके छोटे-से घर में एक अबूझ संसार विद्यमान है । अध्यापक किताबें पढ़ते–पढ़ाते हैं । कभी बच्चों का चेहरा पढ़ें ,मन पढें तो पता चलेगा कि अभी बहुत कुछ पढ़ना बाकी है ।पढ़ाने की तो बात ही छोड़िए। अगर पढ़ने वाला तैयार न हो तो कोई भी तुर्रम खाँ कुछ नहीं पढ़ा सकेगा ।यदि पढ़ने वाला तैयार है तो कम से कम समय में उसे पढ़ाया जा सकता है ।विद्यालय अच्छा परीक्षा-परिणाम दे सकते हैं ,क्या वे विद्यालय बच्चों के चेहरे पर मधुर मुस्कान बिखेर सकते हैं ? यदि नहीं तो उनका वह परीक्षा-परिणाम किसी मतलब का नहीं।मशीनीकरण के इस युग में शिक्षा का भी मशीनीकरण हो गया है ।बच्चे को क्या पढ़ना है ,इसका निर्धारण वे करते हैं जिनको छोटे बच्चों के शिक्षण एवं उनके मनोविज्ञान का व्यावहारिक अनुभव नहीं है । जिनका जीवन बच्चों के निकटतम सान्निध्य में बीता है ,वे ही बच्चों के लिए रोचक, तनाव रहित शिक्षा का सूत्रपात कर सकते हैं । देर –सवेर यह करना ही पड़ेगा ।इसी में नन्हें –मुन्नों का तनावरहित भविष्य निहित है ।

Tuesday, 25 August 2009

सब जनता का है


सब जनता का है 
ये  रुपये पैसे आने सब जनता का है
kकिसी हिंदी फिल्म के गीत  की ये लाइन  वाह ...
हम लुट रहे लोगों को जगाती  झकझोरती सी लगती है . इस लाइन में शाश्वत सत्य निहित है यदि हम सुने .. यदि हम देखें .. यदि हम बोलें ...
यदि हम ने गांधी जी के बंदरों का कोलोन बने .. कुछ न बोलें .. कुछ न देखें.. कुछ न सुने तो ...
ये केद्र सरकार से पैकेज मांगने के लिए लोलुप मंत्री  .... कौन होते हैं हमारे धन की बन्दर बाँट करने वाले?? 
सब जनता का है 
ये  रुपये पैसे आने सब जनता का है
ये जनता को ही दे दें जब ये हक जनता का है 
--
deepzirvi9815524600
http://deepkavyanjli.blogspot.com

Tuesday, 18 August 2009

ये भी मैं हूँ वो भी मैं ही ..

ये भी मैं हूँ वो भी मैं ही ..
एक बूँद गिरी पर गिरे कभी जो मैं ही हूँ .
एक बूँद धरा पर गिरी कभी जो मैं ही हूँ .
एक बूँद अरिहंता बन गिरी समर-आँगन में ,
एक बूँद किसी घर गिरी नवोढा नयनन से ,
एक बूँद कही पर चली श्यामल गगनन से '
एक बूँद कहीं पर मिली सागर प्रियतम से ,
वो बूँद बनी हलाहल जानो मैं ही हूँ ,
वो बूँद बनी जो सागर जानो मैं ही हूँ,
वो बूँद बनी पावन तन जानो मैं ही था ,
वो बूँद बनी प्यासा मन जानो मै ही हूँ .
हर बूँद बूँद में व्यापक व्याप्त मैं ही हूँ
हर बूँद का मालिक पालक बालक मैं ही हूँ .
मैं सागर बादल कमल दामिनी गंगाजल ;
मैं पर्वत गहन गम्भीर हूँ जैसे विंध्यांचल .
बिरहन के मन की पीर से भीगा हूँ आंचल ,
मैं कुल ब्रह्मांड की बेटियों का धर्मी बाबुल .
मैं आदि अनादि मैं मध्य हूँ मैं ही हूँ अनंत ;
मै ग्रीष्म शिशिर हेमंत हूँ मै ही हूँ वसंत .
मैं बीज हूँ जड़ भी मैं ही फल फूल भी मैं .
मैं वो हूँ वो मैं ही हूँ जल कूल भी मैं .
मैं ही हूँ वर्ग पहेली ,वर्ग भी शब्द भी मैं .
मैं ही हूँ रस राग रंग का अर्थ भी मैं .
मैं जान अजान का भेद हूँ मैं ही हूँ ज्ञाता .
कुछ समझना बाकी न है , समझ भी न आता .
वो मायापति अकाल दयाल विशाल भी मैं .
वो घुटनों चलता मूढ़ मती जो बाल भी मैं
You might also like:


deepzirvi
.http://deepkavyanjli.blogspot.com/
ZIRA(FZR)
9815524600
Love Cricket? Check out live scores, photos, video highlights and more. Click here http://cricket.yahoo.com

Saturday, 15 August 2009

कौन सी स्वतन्त्रता के जश्न मना रहे हैं हम

कौन  सी स्वतन्त्रता के जश्न मना रहे हैं हम
 
एक और पन्द्रह अगस्त आया .देश विदेश में सरकारी/गैर सरकारी आयोजनों की भरमार ,धूम धडाका /हो-हल्ला /दूर-दर्शनीय देश प्रेम/और.. फिर बस...
करोडों फूंक कर आयोजित औपचारिक समागमों का तमाम ताम झाम किस लिए ??
किस स्वतन्त्रता का जश्न मनाएं ??
 
आज भारत की आर्थिकता वर्ल्ड बैंक की रखेइल बन चुकी है..कुटीर उद्योगों के गले में डबल्यू टी ओ का फंडा पडा हुआ है ..शिक्षा स्वास्थ्य इत्यादि सभी विभागों का निजीकरण अवश्यम्भावी है ...विश्वी कर्ण  की आंधी में भारतीय सदगुण लुप्त होते दिखाई दे रहे हैं ...
कहाँ है स्वतन्त्रता ?!
क्या मात्र तन की स्वतन्त्रता ही स्वतन्त्रता है?? हमारी सोच ,हमारी मानसिकता तो आज भी परतंत्र है...हमारी मानसिकता तो आज भी पश्चिम की गुलाम है...अपनी अमीर धरोहर को भूल कर पश्चिम का अन्धानुकर्ण करना हमारा स्वभाव बन चुका है... 
-हम किसी भी तथ्य को तथ्य एवम सत्य को सत्य तभी मानते हैं जब पश्चिम उसे सत्यापित  करता है   .
जब दिल ज़हन गुलाम है तो ... जब सोच परतंत्र है तो.. स्वतन्त्रता दिवसों के औपचारिक समागमों का क्या लाभ  ?!सच्ची स्वतन्त्रता अभी आनी है...
-वह भोर जब हमे अपनी धरोहर पर गर्व होगा ...
-हम स्वयम को हिन्दुस्तानी मानने पर गर्व करें गे ...
-जब विदेशों की गुलामी मोल खरीदने की जगह हम अपने भारत की सेवा को सर्वोपरि मानेंगे ...
-तब हो गी सची स्व तंत्रता ....

 

--
deepzirvi
9815524600


चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: HUM, BOLEGA, TO, BOLOGAY...,